पुनर्मूषिको भव - कृतघ्न चूहे की कहानी - ऋषि और चूहा - Phir se Chuha ho Jawo

🐭 पुनर्मूषिको भव

(अर्थात् – फिर से चूहा बन जाओ)

“पुनर्मूषिको भव” एक अत्यंत महत्वपूर्ण और शिक्षाप्रद कथा है। यह कहानी कृतज्ञता और कृतघ्नता के अंतर को बहुत प्रभावशाली ढंग से समझाती है।
यह कथा एक ऐसे चूहे की है, जो एक ऋषि के आशीर्वाद से क्रमशः बिल्ली, कुत्ता और बाघ बन जाता है, लेकिन अंत में कृतघ्नता के कारण फिर से चूहा बन जाता है।




🌿 कथा का आरंभ

एक बार की बात है, जंगल में एक महान ऋषि अपने आश्रम में रहते थे।
ऋषि के तप और साधना के प्रभाव से उनके आश्रम के आसपास का वातावरण अत्यंत पवित्र और शांत था। वहाँ सभी जीव-जंतु निर्भय होकर रहते थे।

एक दिन ऋषि अपने पूजा आसन पर बैठे थे। तभी अचानक एक डरा-सहमा चूहा उनकी गोद में आकर गिर पड़ा।
चूहा बहुत भयभीत था, क्योंकि एक बिल्ली उसे मारकर खाने के लिए उसका पीछा कर रही थी।


🐱 चूहे से बिल्ली

ऋषि ने चूहे की दशा देखकर करुणा की। उन्होंने सोचा—

“यदि इसे बिल्ली से भय है, तो इसे ही बिल्ली बना देता हूँ।”

ऋषि के आशीर्वाद से चूहा बिल्ली बन गया।
अब वह आश्रम के आसपास निडर होकर घूमने लगा और उसे बिल्ली से कोई डर नहीं रहा।


🐶 बिल्ली से कुत्ता

कुछ समय बाद एक दिन एक कुत्ते ने उस बिल्ली का पीछा किया।
डर के मारे बिल्ली भागते हुए फिर ऋषि की शरण में पहुँची।

ऋषि ने कारण पूछा।
बिल्ली बोली—

“महर्षि! कुत्ते मुझे बहुत डराते हैं।”

ऋषि ने कहा—
“स्वानः त्वाम् विभेति, त्वमपि स्वानो भव।”
(अर्थात: कुत्ता तुम्हें डराता है, तुम भी कुत्ता बन जाओ।)

ऋषि के आशीर्वाद से बिल्ली अब कुत्ता बन गई।
अब उसे बिल्लियों और कुत्तों से कोई भय नहीं रहा।


🐯 कुत्ते से बाघ

एक दिन जंगल में एक बाघ की दृष्टि उस कुत्ते पर पड़ी।
बाघ उसे खाने के लिए दौड़ा।

डर के मारे कुत्ता फिर ऋषि के पास पहुँचा।

ऋषि बोले—
“ब्याघ्रः त्वाम् विभेति, त्वमपि ब्याघ्रो भव।”
(अर्थात: बाघ तुम्हें डराता है, तुम भी बाघ बन जाओ।)

ऋषि के आशीर्वाद से वह भयानक बाघ बन गया।
अब उसे जंगल के किसी भी जीव से डर नहीं था।


😔 कृतघ्नता का जन्म

जंगल के अन्य जानवर आपस में बातें करने लगे—

“यह बाघ पहले चूहा था। ऋषि के वरदान से बाघ बना है।”

यह बातें सुनकर बाघ को लज्जा और क्रोध आने लगा।
वह सोचने लगा—

“जब तक यह ऋषि जीवित हैं, लोग मेरे बारे में यही कहते रहेंगे।”

धीरे-धीरे बाघ के मन में कृतघ्नता भर गई।
उसने ऋषि को ही अपनी समस्या का कारण मान लिया और उन पर आक्रमण कर दिया


🕉️ पुनर्मूषिको भव

ऋषि ने बाघ की कुटिलता पहचान ली।
उन्होंने शांत स्वर में कहा—

“कृतघ्नोऽसि, पुनर्मूषिको भव।”
(तुम कृतघ्न हो, फिर से चूहा बन जाओ।)

ऋषि के शाप से वह बाघ क्षण भर में फिर से चूहा बन गया


📖 शब्दार्थ

  • कृतज्ञ – जो किसी के किए उपकार को मानता और याद रखता है

  • कृतघ्न – जो किसी के किए उपकार को नहीं मानता


🌟 शिक्षा (Moral of the Story)

👉 हमें सदैव कृतज्ञ रहना चाहिए।
जो व्यक्ति उपकार को भूलकर अहंकार में डूब जाता है, उसका पतन निश्चित होता है।


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कृतघ्न चूहे की कहानी 

 

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