एक गाँव में एक बनिया रहता था। उसका तेल और घी का व्यापार था। ग्राहकों को सामान देते समय वह इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि कहीं तौल में किसी को ज़रा-सा भी ज़्यादा न मिल जाए।
उसकी कंजूसी इतनी मशहूर थी कि उसके परिवार वाले और नौकर-चाकर सभी इससे भली-भाँति परिचित थे।
👕👞 कंजूसी की आदत
हर सुबह वह अपनी दुकान जाने के लिए निकलता।
दुकान जाते समय वह—
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कुर्ता कंधे पर रख लेता
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जूते हाथ में ले लेता
जब दुकान क़रीब आ जाती, तब—
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कुर्ता पहन लेता
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पैरों से धूल झाड़कर जूते पहनता
उसका मानना था कि ऐसा करने से कपड़े और जूते ज़्यादा दिन तक चलेंगे और खर्च कम होगा।
🧈 घी और पंखे की चिंता
एक बार बनिए ने गाँव के एक ग्वाले से घी खरीदा।
सुबह वह घी का बर्तन लेकर दुकान की ओर चला।
रास्ते में उसे अचानक याद आया—
“अरे! कमरे का पंखा तो चालू छोड़ आया हूँ। अगर बंद नहीं किया तो कितनी बिजली बर्बाद हो जाएगी!”
बस फिर क्या था!
कंधे पर कुर्ता, एक हाथ में जूते और दूसरे हाथ में घी का बर्तन लेकर वह घर वापस लौट पड़ा।
घर पहुँचकर उसने दरवाज़ा खटखटाया।
नौकर ने अंदर से पूछा—
“कौन है?”
बनिए ने कहा—
“मैं हूँ, दरवाज़ा खोलो। पंखा बंद करना है।”
नौकर बोला—
“सेठ जी, बार-बार दरवाज़ा खोलने से कब्ज़े घिस जाएंगे। वैसे मैंने पंखा पहले ही बंद कर दिया है।”
यह सुनकर कंजूस बनिया बहुत खुश हुआ और फिर दुकान की ओर लौट पड़ा।
🪰 मक्खी और कंजूसी की हद
रास्ते में उसने सोचा—
“ज़रा देख लूँ, घी शुद्ध है या नहीं… देशी घी की खुशबू आती है या नहीं।”
उसने जैसे ही घी के बर्तन का ढक्कन खोला—
एक मक्खी घी में गिर गई!
बनिए को बहुत गुस्सा आया।
उसने मक्खी को बाहर निकाला और उँगलियों से निचोड़कर सारा घी निकाल लिया, फिर मक्खी को ज़मीन पर फेंक दिया।
लेकिन…
उसे फिर भी संतोष नहीं हुआ।
उसने सोचा—
“शायद मक्खी के शरीर में अभी भी थोड़ा-सा घी बचा हो!”
बस यही सोचकर उसने मक्खी को उठाया और अपने मुँह में रखकर चूसने लगा।
🏷️ नाम और पहचान
उस दिन के बाद से गाँव में कंजूस लोगों के लिए
“मक्खीचूस” शब्द चल पड़ा।
आज भी जब कोई व्यक्ति कंजूसी की सारी सीमाएँ पार कर देता है, तो लोग उसे
👉 मक्खीचूस कहने लगते हैं।
📌 शिक्षा (Moral of the Story):
👉 अत्यधिक कंजूसी इंसान की इज़्ज़त और समझ दोनों को नुकसान पहुँचाती है।
हमें बचत करनी चाहिए, लेकिन कंजूसी की हद तक नहीं।
✍️ आपकी बारी!
इस मक्खीचूस बनिया की कहानी से आपको क्या शिक्षा मिली?
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