भारतीय दर्शन में सुखों का उत्तरोत्तर क्रम

 भारतीय दर्शन में सुख को केवल भौतिक आनंद तक सीमित नहीं माना गया है, बल्कि उसे इन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, सूक्ष्म शरीर और आत्मा—इन सभी स्तरों पर समझाया गया है। शास्त्रों के अनुसार सुख जितना स्थूल होता है, उतना ही क्षणिक होता है; और जितना सूक्ष्म होता है, उतना ही गहन एवं स्थायी होता है।

यहाँ हम इन्द्रिय-सुख, कर्मेन्द्रिय-सुख और सूक्ष्म शरीर के सुख—इन तीनों को उत्तरोत्तर क्रम में समझेंगे।




1. इन्द्रिय-सुखों का उत्तरोत्तर क्रम

इन्द्रियाँ वे साधन हैं जिनसे मनुष्य बाह्य जगत का अनुभव करता है। इनके सुख क्षणिक होते हैं, फिर भी शास्त्रों में इनमें भी श्रेष्ठता का क्रम बताया गया है।

इन्द्रिय-सुखों का क्रम (निम्न से श्रेष्ठ की ओर)

  1. स्पर्श (त्वचा) – शीत-उष्ण, कोमलता आदि का सुख।

  2. रस (जीभ) – स्वादिष्ट भोजन-पान का सुख।

  3. रूप (नेत्र) – सौंदर्य, प्रकृति, कला का आनंद।

  4. गंध (नाक) – सुगंध का सूक्ष्म सुख।

  5. शब्द (कान) – संगीत, मंत्र, भजन का आनंद।

👉 निष्कर्ष: इन्द्रिय-सुखों में शब्द से प्राप्त सुख सबसे श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि यह सबसे सूक्ष्म और गहन होता है।


2. कर्मेन्द्रियों के सुखों का उत्तरोत्तर क्रम

कर्मेन्द्रियाँ वे हैं जिनके माध्यम से मनुष्य कर्म करता है। इनके सुख केवल भोगात्मक नहीं, बल्कि कर्तृत्व और संतोष से भी जुड़े होते हैं।

पाँच कर्मेन्द्रियाँ

  • पायु

  • उपस्थ

  • पाणि

  • पाद

  • वाक्

कर्मेन्द्रिय-सुखों का क्रम

  1. पायु का सुख – मलत्याग से मिलने वाला क्षणिक आराम।

  2. उपस्थ का सुख – काम-सुख, भोग-संबंधी आनंद।

  3. पाणि का सुख – दान, सेवा, निर्माण से मिलने वाला संतोष।

  4. पाद का सुख – गमन, यात्रा, पुरुषार्थ का आनंद।

  5. वाक् का सुख – सत्य वचन, उपदेश, भजन-कीर्तन का सुख।

👉 निष्कर्ष: कर्मेन्द्रियों में वाक् (वाणी) का सुख सबसे श्रेष्ठ माना गया है।


3. सूक्ष्म शरीर के सुखों का उत्तरोत्तर क्रम

सूक्ष्म शरीर में मन, चित्त, अहंकार और बुद्धि सम्मिलित हैं। इनके सुख इन्द्रिय-सुखों से अधिक सूक्ष्म, स्थिर और गहन होते हैं।

सूक्ष्म शरीर के सुख

  1. मन का सुख – इच्छा-पूर्ति, कल्पना और स्मृति से उत्पन्न आनंद।

  2. चित्त का सुख – शांति, शुभ संस्कार और ध्यान की प्रारंभिक अवस्था का सुख।

  3. अहंकार का सुख – मान, यश, कर्तृत्व-बोध से मिलने वाला आनंद।

  4. बुद्धि का सुख – ज्ञान, विवेक और सत्य-बोध से उत्पन्न आनंद।

👉 निष्कर्ष: सूक्ष्म शरीर में बुद्धि का सुख सबसे श्रेष्ठ माना गया है, जो ब्रह्मानन्द के सबसे निकट है।


समग्र निष्कर्ष

भारतीय दर्शन के अनुसार सुख का क्रम इस प्रकार समझा जा सकता है—

इन्द्रिय-सुख < कर्मेन्द्रिय-सुख < सूक्ष्म शरीर का सुख < आत्मिक (ब्रह्मानन्द)

जहाँ इन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय सुख क्षणिक हैं, वहीं सूक्ष्म शरीर के सुख अपेक्षाकृत स्थायी हैं। इन सबके पार जो आनंद है, वही आत्मिक या ब्रह्मानन्द है, जो शाश्वत और परम सत्य माना गया है।

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