भारत की खाद्य परंपरा केवल स्वाद की नहीं, बल्कि संस्कृति, दर्शन और जीवन-मूल्यों की अभिव्यक्ति रही है। परंतु पिछले कुछ दशकों में हमने देखा कि जो चीज़ें भारतीय परंपरा का हिस्सा नहीं थीं, वे धीरे-धीरे सामान्य, ज़रूरी और यहाँ तक कि स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य घोषित कर दी गईं। अंडा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
1. पाश्चात्य जगत की रणनीति: कस्टमर बेस निर्माण
पाश्चात्य सोच में भोजन को संस्कृति नहीं, बल्कि प्रोडक्ट माना जाता है। भारत जैसे विशाल देश में अंडे के लिए बाज़ार बनाना आसान नहीं था, क्योंकि:
भारत की बड़ी आबादी शाकाहारी थी
वैष्णव, जैन, आर्य, सनातन परंपराओं में अंडे का निषेध था
इस बाधा को तोड़ने के लिए धीमी लेकिन सुनियोजित रणनीति अपनाई गई:
अंडे को "नॉन-वेज नहीं बल्कि न्यूट्रल फूड" कहा गया
"अनिषेचित अंडा" जैसे शब्द गढ़े गए
धार्मिक और सांस्कृतिक आपत्तियों को वैज्ञानिक शब्दों से ढका गया
2. किराना दुकान में दूध, ब्रेड और अंडा – एक मनोवैज्ञानिक चाल
जब अंडा पहली बार किराना दुकानों में दूध और ब्रेड के साथ रखा गया, तब यह केवल सुविधा नहीं थी, बल्कि मनोवैज्ञानिक रणनीति थी।
दूध = सात्त्विक
ब्रेड = मॉडर्न
अंडा = "नॉर्मल"
तीनों को एक साथ रखकर अंडे को भी उसी श्रेणी में स्थापित कर दिया गया। धीरे-धीरे यह संदेश गया कि:
"अगर दूध ठीक है, ब्रेड ठीक है, तो अंडा भी ठीक ही होगा।"
3. हॉस्पिटल और जिम: स्वास्थ्य के नाम पर प्रचार
इसके बाद अगला चरण आया – स्वास्थ्य संस्थानों का उपयोग:
हॉस्पिटल
मरीजों को "प्रोटीन" के नाम पर अंडा सुझाया गया
वैकल्पिक भारतीय प्रोटीन स्रोतों (दाल, दूध, घी, पनीर) को कमतर बताया गया
जिम और फिटनेस इंडस्ट्री
बॉडी बनाने का एकमात्र रास्ता अंडा बताया गया
देसी पहलवानों की परंपरा को भुला दिया गया
इस पूरी प्रक्रिया में यह कभी नहीं बताया गया कि:
भारतीय शरीर रचना और पाचन पाश्चात्य से अलग है
प्रोटीन का अवशोषण केवल मात्रा से नहीं, संस्कार से जुड़ा है
4. पैसे लेकर भ्रामक विज्ञापन: खलनायक और खलनायिकाएँ
टीवी, अख़बार और सोशल मीडिया पर:
सेलेब्रिटी डॉक्टर
फिल्मी सितारे
फिटनेस इन्फ्लुएंसर
सबने अंडे की वकालत की — पैसे लेकर।
इन विज्ञापनों में:
अंडे को "सुपरफूड" बताया गया
बच्चों के दिमाग में यह डाला गया कि बिना अंडे के वे कमजोर रह जाएंगे
यहाँ सवाल यह नहीं कि अंडा क्या है, सवाल यह है कि:
क्या सच को विज्ञापन की ज़रूरत होती है?
5. गांधी जी और अनिषेचित अंडा: आधा सच, पूरा भ्रम
अक्सर कहा जाता है कि गांधी जी ने भी अनिषेचित अंडे की वकालत की।
लेकिन:
यह उनकी विशेष परिस्थिति थी, सार्वभौमिक सिद्धांत नहीं
गांधी जी का जीवन प्रयोगों से भरा था, बाज़ार बनाने से नहीं
गांधी जी के नाम का उपयोग कर दूध और अंडे को एक ही तराजू पर तौलना बौद्धिक बेईमानी है।
6. वैष्णव क्षेत्र हरियाणा: एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार
जिस हरियाणा में:
दूध, दही, घी जीवन का आधार था
वैष्णव परंपरा गहरी थी
वही हरियाणा आज:
अंडे का बड़ा उपभोक्ता बन गया
सरकारी योजनाओं में अंडा अनिवार्य हो गया
यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं, बल्कि नीति और प्रचार का परिणाम है।
7. लोकगीत से ऑमलेट तक: सांस्कृतिक पतन की तस्वीर
जिस समाज के गीत कहते थे:
"खाले बाजरे की रोटी, भोलेनाथ भांग पीनी भूल जावेगा"
आज वही समाज:
ऑमलेट को मॉडर्न मान रहा है
चिकन सूप को स्टेटस सिंबल
यह केवल भोजन परिवर्तन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विच्छेदन है।
8. निष्कर्ष: जो परंपरा में नहीं, उसे जगह क्यों?
हर नया बदलाव प्रगति नहीं होता।
जो चीज़:
हमारी परंपरा में नहीं
हमारे दर्शन से मेल नहीं खाती
और जिसे थोपने के लिए विज्ञापन चाहिए
उसे अपनाने से पहले प्रश्न करना ज़रूरी है।
जो परंपरा में नहीं है, उसे कभी बिना विवेक के जगह नहीं देनी चाहिए।
आज आवश्यकता है कि हम:
देसी ज्ञान पर भरोसा करें
प्रचार और विज्ञान में अंतर समझें
और भोजन को फिर से संस्कृति के रूप में देखें, सिर्फ़ प्रोडक्ट के रूप में नहीं।
यह लेख विचारोत्तेजक विमर्श के उद्देश्य से लिखा गया है, निर्णय पाठक के विवेक पर छोड़ता है।

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